Wednesday, June 26, 2019

संजीव भट्ट को जेल पहुंचाने वाला 1990 का वो मामला

उन्होंने मुझे बताया कि मौत की सज़ा ने समय को लेकर उनकी समझ को ही गड़बड़ कर दिया है. उनकी संवेदनाएं मर चुकी हैं. उनकी ज़िंदादिली कहीं गुम हो गई है. उनके लिए काम पर वापस जाना भी मुश्किल हो रहा है. उन्हें हाई ब्लड प्रेशर, अनिद्रा, डायबिटीज़ और आंखों की कमज़ोर रोशनी जैसी कई बीमारियां लग गई हैं. उनके दिन सस्ती शराब के नशे की मदद से जैसे-तैसे गुज़र रहे हैं. उनमें से कुछ तो नींद की गोलियां और डिप्रेशन से लड़ने वाली दवाएं भी ले रहे हैं.
49 बरस के बापू अप्पा शिंदे कहते हैं, ''जेल आप को धीरे-धीरे गुपचुप तरीक़े से मारती है. जब आप जेल से छूटते हैं, तो आज़ादी अखरने लगती है''.
जब ये लोग जेल चले गए, तो इनकी बीवियों और बच्चों को काम करना पड़ा. उन्हें नालियां और कुएं साफ़ करने पड़े और कूड़ा बीनना पड़ा. ज़्यादातर बच्चे स्कूल नहीं जा सके. वो जिस इलाक़े में रहते हैं, वो कई साल से सूखे का शिकार है. ऐसे में खेती में रोज़गार ही नहीं है.
अब, रिहा किए गए ये लोग कहते हैं कि कोई भी हर्ज़ाना, कोई मुआवज़ा उन्हें खोया हुआ वक़्त नहीं वापस दे सकता. उनके जेल में रहने का जो नतीजा परिजनों ने भुगता, उसकी पैसे से भरपाई नहीं हो सकती.
2008 में बापू अप्पा के 15 साल के बेटे राजू की करंट लगने से मौत हो गई थी. वो जिस फावड़े से नाले की सफ़ाई कर रहा था, वो बिजली के नंगे तार से छू गया था.
बापू अप्पा बताते हैं, ''वो मेरे परिवार का सबसे समझदार बच्चा था. अगर मैं जेल में नहीं गया होता, तो उसे ये काम करते हुए जान नहीं गंवानी पड़ती.''
जब बापू अप्पा और उनके भाई राज्या अप्पा जेल से छूटकर घर लौटे, तो उन्होंने अपने परिवारों को बहुत बुरी हालत में पाया. उनका घर मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका था. उनके परिवार के सदस्य खुले में एक पेड़ के नीचे सोने को मजबूर थे. उन्होंने एक ख़ाली पड़ी सरकारी इमारत में अपना ठिकाना बनाया हुआ था. उनके बच्चों ने अपने पिता के स्वागत के लिए टीन की झोपड़ी तैयार की थी.
राज्या अप्पा कहते हैं, ''हम अब आज़ाद तो हैं, पर बेघर हो गए हैं.''
राजू शिंदे की शादी जेल जाने से तीन महीने पहले ही हुई थी. जब पुलिस ने राजू को गिरफ़्तार किया तो, उनकी पत्नी उन्हें 12 बरस पहले छोड़कर किसी और आदमी के पास चली गई.
राजू शिंदे बताते हैं, ''मुझे छोड़कर जाने से 12 दिन पहले वो मुझसे मिलने जेल में आई थी. लेकिन उसने मुझे ये नहीं बताया कि वो मुझे छोड़कर किसी और के साथ रहने जा रही है. शायद उस पर अपने परिवार का दबाव बहुत ज़्यादा था''. राजू शिंदे ने हाल ही में दोबारा शादी की है.
बरी होने वाले छह में से दो लोगों के मां-बाप की मौत उनके जेल में रहने के दौरान हो गई. बेटों को मौत की सज़ा सुनाए जाने की ख़बर सुन कर उन्हें दिल का दौरा पड़ गया था.
उनके ग़रीब परिवारों को अक्सर नागपुर की जेल में मुलाक़ात के लिए बिना टिकट ट्रेन का सफ़र करना पड़ता था.
इनमें से एक की पत्नी रानी शिंदे बताती हैं, ''अगर टिकट कलेक्टर हमें पकड़ लेता था, तो हम उसे बताते थे कि हमारे पति जेल में हैं और हम बहुत ग़रीब हैं. हमारे पास टिकट के पैसे नहीं हैं. कभी कोई टिकट कलेक्टर भला मानुस होता था, तो उन्हें गाड़ी से नहीं उतारता था. लेकिन कई बार उन्हें ट्रेन से उतार भी दिया जाता था. ग़रीब की कोई इज़्ज़त नहीं है.''
राजू शिंदे कहते हैं, ''हमारा सब-कुछ छीन लिया गया. हमारी ज़िंदगी, हमारी रोज़ी. हमारा सब-कुछ लुट गया. और ऐसे अपराध के लिए जो हमने किया ही नहीं था.''
इन छहों लोगों को 5 जून 2003 की रात को नासिक के एक अमरूद के बाग़ में एक ही परिवार के पांच लोगों की हत्या का दोषी पाया गया था. जहां ये लोग रहते हैं, नासिक वहां से क़रीब 300 किलोमीटर दूर है.
मारे गए लोगों के परिवार के केवल दो लोग इस हत्याकांड में बचे थे. इनमें एक आदमी और उसकी मां थे.
उन्होंने पुलिस को बताया कि सात से आठ लोगों ने उनके बाग़ पर हमला किया था. जब वो झोपड़ी में घुसे, तो, उनके पास चाकू, हंसिया और डंडे थे. झोपड़ी में बिजली नहीं थी. वो सभी हिंदी बोलने वाले थे और कह रहे थे कि वो मुंबई से आए हैं. उन्होंने बैटरी से चलने वाले टेप रिकॉर्डर को बहुत तेज़ आवाज़ में बजाना शुरू किया. इसके बाद उस बाग़ में रहने वाले परिवार से उनके पैसे और गहने मांगे.
दो चश्मदीदों के मुताबिक़, उन्होंने हमलावरों को क़रीब 6500 रुपए के पैसे और गहने दे दिए. इसके बाद हमलावरों ने शराब पी और फिर उनके परिवार पर हमला किया और पांच लोगों को मार डाला. इसके बाद उन्होंने मर चुकी औरत से बलात्कार भी किया. मारे गए सभी लोगों की उम्र 13 से 48 साल के बीच थी.
पुलिस ने अगली सुबह पूरे बाग़ में बिखरा हुआ ख़ून देखा था. उन्होंने वारदात वाली झोपड़ी से कैसेट के टेप, लकड़ी का डंडा, एक हंसिया और 14 जोड़ी सैंडल बरामद किए थे. उन्होंने ख़ून के धब्बे और हाथ के निशान भी दर्ज किए.
क़त्ल के एक दिन बाद पुलिस ने कुछ स्थानीय अपराधियों की फोटो पीड़ित चश्मदीद महिला को दिखाई. वो मुख्य गवाह बन चुकी थी. पुलिस ने उन तस्वीरों में से 19 से 35 साल के चार लोगों की शिनाख़्त की.
एक वक़ील ने बताया, ''वो सभी स्थानीय अपराधी थे और पुलिस रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज़ था''.
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़, पुलिस और सरकारी वक़ील ने ''इस सबूत को दबा दिया और चारों ही संदिग्धों को गिरफ़्तार नहीं किया गया''.
इसके बजाय, घटना के तीन हफ़्ते बाद पुलिस ने शिंदे परिवार के सदस्यों को हिरासत में ले लिया. जबकि शिंदे परिवार घटनास्थल से सैकड़ों किलोमीटर दूर रहता था. वो कभी भी नासिक नहीं गए थे.

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